Makar Sankranti Festival Celebrations in Alirajpur

Alirajpur ( Madhya Pradesh ): According to Indian Culture, turmeric and kumkum are exchanged on the eve of marriage. With the passage of time we have forgotten their importance. For any sort of work, the body being the medium needs to be all right. But now-a-days, the body has become hollow owing to various diseases. In spite of advancement of medical science and doing pranayam and yoga, all efforts become futile.

Soul is the master of the body, and based upon the quality of the soul, the body express its strength. Unless we bring richness in our thought, our body can’t be healthy. Owing to breaking the pledge of celibacy, and as our mind moves amidst many body stripes instead of one, the body becomes a victim of premature death. Addressing women of the city on the “Haldi Kumkum Makar sankranti festival,” National Executive member of the Religious wing of the Rajayoga Education and Research Fund of the Brahma Kumaris BK Narayan from Indore spoke the above at the meeting hall at Deepa ki Chowki.

Citing the spiritual significance of Makar sankranti, BK Madhuri said that Sun of Knowledge, Supreme Soul imparts knowledge and yoga as a result of which we enjoy unlimited peace and Happiness for two thousand five hundred years and again, as we are depleted of our virtues, we suffer the next two thousand five hundred years. We have experienced many revolutions, but it is time to make our life clean both internally and outwardly and that is the gift of the festival makar sankranti.

Speaking on this occasion, Additional Police Superintendent Seema Alaba said that it is a beautiful coincidence that at this time of the year festivals like Pongal, Onam, Lohri, etc., are celebrated in different corners of India. All the festivals connected with harvesting display happiness and are celebrated with enthusiasm. On this occasion, different sweet dishes are prepared. Laddu made of sesame seeds represents unity of souls which strengthens humanity. People donate polenta and sesame which speaks of the dilution of evil in human nature, therefore need to be refined and purified. At the end of the programme all the participants practiced Rajayoga Meditation.

In Hindi:

अलीराजपुर: भारतीय संस्कृति में शादी के अवसर पर हल्दी, कुमकुम का आदान-प्रदान होता है ।जिसका हमारे जीवन से गहरा नाता है। काल परिवर्तन के साथ हम इसके रहस्य को भूल गए हैं। हल्दी का उबटन तन के स्वास्थ्य का प्रतीक है। कोई भी कार्य व साधना के लिए तन रुपी साधन ठीक हो तभी कार्य ठीक ढंग से कर सकते हैं ।लेकिन आज तन में अनेक शारीरिक रोग होने के कारण तन खोखला होता जा रहा है। वर्तमान समय मेडिकल साइंस इतनी एडवांस होते हुए भी व समाज में अनेक प्राणायाम, योग क्रियाएं मौजूद होने के बाद भी सारे प्रयास विफल होते जा रहे हैं। तन का मालिक आत्मा है, जैसे आत्मा की क्वालिटी होगी वैसा तन रूपी फल मिलता है। बाहरी रीति से आप कितना भी प्रयास करते रहे लेकिन जब तक हमारे विचारो, भावना में श्रेष्ठता नहीं होगी तन कभी भी स्वस्थ नहीं हो सकता है ।कुमकुम सुहागवती व ब्रह्मलोक की निशानी है ।जब हम अपने विचारों में एक पतिव्रता का संकल्प लेकर चलते हैं तो हमारा सुहाग सदा सलामत रहता है । जैसे हनुमान जी ने अपने शरीर पर सिंदूर लगाकर दिल में राम को बसा कर अपने शरीर को वज्र के समान शक्तिशाली बनाया और अपने दिल में एक परमात्मा को बसा कर अपने जीवन को अमर किया। यही निशानी कुमकुम की है ।पति-पत्नी की जोड़ी सतयुग त्रेता में जीवन के अंत तक सलामत रहती है ।आज हमारे जीवन में यह व्रत भंग होने से अपने मन में एक पति के अलावा अनेक शरीर धारियों को अंदर बैठा देने से जीवन अकाल मौत का शिकार होने लगता है ।आंतरिक शक्तियां खत्म होने से तन व सुहाग दोनों खतरे में पड़ जाते हैं। यह विचार इंदौर से पधारे धार्मिक प्रभाग के राष्ट्रीय कार्यकारी सदस्य ब्रह्माकुमार नारायण भाई ने दीपा की चौकी में स्थित ब्रह्माकुमारी सभागृह में आयोजित हल्दी मकर सक्रांति के पर्व पर आयोजित हल्दी कुमकुम कार्यक्रम में शहर की महिलाओं को संबोधित कर रहे थे।

इस अवसर पर ब्रह्माकुमारी माधुरी बहन ने बताया की मकर संक्रांति पर सूर्य 6 मास के लिए उत्तरायण की ओर पदार्पण करता है ।जिससे दिन बड़े होने लगते हैं। इसका भावार्थ यह है कि वर्तमान समय परमात्मा ज्ञान सूर्य आकर हमें ज्ञान योग की शिक्षा दे रहे हैं, जिससे ढाई हजार वर्ष, आधा कल्प हम उत्तरायण की दिशा में रहते हैं अर्थात सदा जीवन में सुख शांति बनी रहती है और फिर यही सूर्य जब 6मास के लिए दक्षिणायन की ओर प्रस्थान करता है अर्थात हमारे जीवन में सुख शांति खत्म होकर दुख अशांति का राज कायम हो जाता है । दुनिया में अनेक क्रांतिया जैसे हरित क्रांति ,श्वेत क्रांति, स्वतंत्र आंदोलन की क्रांति ,नारी क्रांति हुई है ।लेकिन अब हमें जीवन को अंदर-बाहर स्वच्छ बनाकर श्वेत क्रांति जीवन में लानी है इसके बाद फिर कोई भी क्रांतियों की आवश्यकता नहीं होगी यही मकर सक्रांति की गिफ्ट है ।  इस अवसर पर अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सीमा अलावा ने बताया कि वास्तव मे यह संस्कार परिवर्तन मे क्रांति लाने का ही पर्व ‘संक्रांति’ है। भारतीय संस्कृति में मकर संक्रान्ति का पर्व अनेक आध्यात्मिक रहस्य से परिपूर्ण है। यह सुसंयोग ही है कि लगभग इसी समय भारत के विभिन्न प्रान्तों में पोंगल, ओणम, लोहड़ी आदि विभिन्न नामों से खुशियों का पर्व मनाया जाता है। इन सभी पर्वो में एकरूपता यह है कि उक्त सारे ही पर्व नयी फसल के आने के समय, आम जनमानस की खुशी को दर्शाते हुए बड़े उत्सव पूर्वक मनाये जाते हैं। और इस अवसर पर सभी मिलकर नाचते, गाते और झूमते हैं। एक- दूसरे को बधाइयाँ देते हैं और तरह-तरह के पकवान बनाते तथा खाते हैं। इस खुशी के माहौल में लोग आपस के गिले-शिकवे भुलाकर एक दूसरे को गले लगाते हैं तिल खाना- खिलाना वास्तव में छोटी चीज़ की तुलना तिल से की गयी है। आत्मा भी अति सूक्ष्म है। अर्थात तिल आत्म स्वरूप में टिकने का यादगार है। तिल के लड्डू खाना -*
जैसे तिल के लड्डू छोटे तिल के दानों से मिलकर बनते हैं, उसी प्रकार हमें तिल समान सभी आत्माओं के साथ एक जुट होकर एकता मे रहना है और संगठन को मज़बूत बनाना है। तिल को अलग खाओ तो कड़वा महसूस होता है। अर्थात अकेले मे भारीपन का अनुभव होता ह खिचड़ी और तिल का दान –
इस दिन खिचड़ी और तिल का दान करते हैं, इसका भाव यह है कि मनुष्य के संस्कारों मे आसुरियता की मिलावट हो चुकी है, अर्थात उसके संस्कार खिचड़ी हो चुके हैं, जिन्हें परिवर्तन करके अब दिव्य संस्कार धारण करने हैं। कार्यक्रम के अंत में सभी को राजयोग की अनुभूति कराई गई अंत में सभी को हल्दी, कुमकुम व फलाआहार दिया गया।